आज मै आपको बिहार दर्शन में नालंदा भ्रमण कराने ले जाऊँगा ,तो चलते है ✈🚊🚌🚕"नालंदा"
नालंदा बिहारशरीफ के पास पटना के लगभग 95 km दक्षिणपूर्व में स्थित है ; यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है |
नालंदा 5 वीं और 6 वीं शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के संरक्षण के तहत और बाद में कन्नौज के सम्राट हर्ष के अधीन विकसित हुआ | गुप्त युग से विरासत में मिली सांस्कृतिक परंपरा 9 वीं शताब्दी तक विकास और समृद्धि की अवधि हुई |बाद में इसका धीरे -धीरे गिरावट का समय था |
नालंदा प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का विख्यात केंद्र था | बौद्ध धर्म में (महायान और हीनयान )के साथ अन्य धर्मो के तथा अनेक देशो के छात्र यहाँ पढ़ते थे |
यह राजगीर से 11. 4kmउत्तर में स्थित है | नालंदा विश्व विद्यालय दूनिया का दूसरा प्राचीन विश्व विद्यालय है | 7 वीं शताब्दी में भारत के इतिहास को पढ़ने आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा ितिसंग के यात्रा विवरणो से नालंदा विश्व विद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है | अलेक्जेंडर द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्व विद्यालय के अवशेष इसके प्राचीन वैभव के बारे में बहुत कुछ बताता है | इस विश्व विद्यालय में 10000 छात्रो को पढ़ाने केलिए 2000 शिक्षक थे | प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7 वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था |प्रसिद्ध बौद्ध सारिपुत्र का जन्म यहीं हुआ था |
यहाँ के लाईब्रेरी में हजारो पुस्तको के साथ 90 लाख पांडुलिपियाँ रखी हुई है | इस जगह को बख्तियार खिलजी ने आक्रमण कर आग लगा थी , जिसे बुझाने में 6 महीने से ज्यादा समय लग गए थे | नालंदा 800 साल तक अस्तित्व में रही |यहाँ छात्रों का निः शुल्क शिक्षा दी जाती थी |
इस यूनिवर्सिटी में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि कोरिया ,जापान ,चीन ,तिब्बत ,इंडोनेशिया ,ईरान ग्रीस ,मंगोलिया समेत कई दूसरे देशो के छात्र भी पढाई के लिए आते थे |
नालंदा यूनिवर्सिटी की स्थापना 5 वीं शताब्दी में गुप्त वंश के शासक सम्राट कुमार गुप्त ने की थी | गौतम बुद्ध भी यहाँ कई बार यात्रा लिए आये और रुके भी थे |
यूनिवर्सिटी में 'धर्म गूंज ' नाम की लाइब्रेरी थी , जिसका अर्थ 'सत्य का पर्वत 'से था | लाइब्रेरी के 9 मंजिलो में तीन भाग थे ,जिनके नाम 'रत्नरंजक ',रत्नोदधि ',और 'रत्नसागर 'थे |
नालंदा यूनिवर्सिटी में हर्षवर्धन ,धर्मपाल ,वसुबन्धु ,धर्मकीर्ति ,नागार्जुन के साथ कई अन्य विद्वानों पढाई की थी |
स्थापना व संरक्षण :-
इस विश्व विद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम 450 -470 को प्राप्त है | इस विश्व विद्यालय को हेमंतकुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला | गुप्त वंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासको वंशो ने इसकी समृद्धि में पूरा अपना योगदान दिया था | इसे हर्षवर्धन और पाल वंशो का भी संरक्षण मिला ,इसे विदेशी शासको से भी अनुदान मिला |
स्वरूप :-
यह दुनिया का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्व विद्यालय था | यह अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था | इसके परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था | जिसमे प्रवेश के लिए लिए एक मुख्य द्वार था | उत्तर से दक्षिण की ओर मठो की कतार थी ,और उनके सामने अनेक स्तूप और मंदिर थे | मंदिरो में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थी | केंद्रीयविद्यालय में 7 बड़े कक्ष थे,और इसके अलावा 300 अन्य कमरे थे | इस विश्व विद्यालय में मेरिट पे दाखिला होता था ;निःशुल्क पढ़ाया जाता था |
ऐतिहासिक उल्लेख :-
चीनी विद्वान यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने कई वर्षो तक यहाँ सांस्कृतिक व दर्शन की शिक्षा ग्रहण की | ह्वेनसांग ने लिखा है ,कि सहस्त्रो छात्र नालंदा में अध्ययन करते थे,और इसी कारण नालंदा प्रख्यात हो गया था | इत्सिंग ने लिखा है की विश्व विद्यालय के विख्यात विद्वानो के नाम विश्व विद्यालय के मुख्य द्वार पर स्वेत अक्षरो में लिखे जाते थे |

अन्य स्थल :-
विश्व विद्यालय परिसर के विपरीत दिशा में एक छोटा सा पुरात्विक संग्रहालय बना हुआ है | इस संग्रहालय में खुदाई से प्राप्त अवशेषों को रखा गया है |
यहाँ भगवान् बुद्ध की बहुत साड़ी मूर्तियों का संग्रह रोचक लगता है | सबसे रोचक बुद्ध की टेराकोटा मूर्तियां लगती है,जो यहाँ बहुत व्यवस्थित राखी गई है |
नई नालंदा महाविहार :-
यह एक शिक्षा का केंद्र है | इसमें पाली और बौद्ध धर्म की पढ़ाई तथा शोध होती है | यह एक नया स्थापित संस्थान है |
ह्वेनत्सांग मेमोरियल हॉल :-
यह एक नया निर्माण भवन है | जो चीन के महान तीर्थ यात्री ह्वेनत्सांग की स्मृति में बनवाया गया है |
बड़गांव ,सिलाव राजगीर:-
बड़गांव नालंदा का सबसे निकट का गाँव है | यहाँ एक सरोवर और प्राचीन सूर्य मंदिर है ,यह स्थान छठ पूजा के लिए प्रसिद्ध है| नालंदा से कुछ दूर पर सिलाव स्थित है ,जो मिठाई "ख़ाजा"के लिए प्रसिद्ध है | इसके पास में ही राजगीर है |
अब कुछ नई पहलू :-
नालंदा विश्व विद्यालय के नाम पर एक नए विश्व विद्यालय की स्थापना की है ,प्रसिद्ध नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार अमर्त्य सेन अनुसार वर्ष 2010 में शैक्षणिक सत्र आरम्भ हो गए | इसको फिरसे बनाने में सिंगापूर ,चीन जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग दिया है |
कोसिस यह है कि इसके पुराने स्वरूप को कोई हानि न पहुंचे और यह फिर से नया और सुन्दर व्यवस्थित हो जाए |
ये था आज का नालंदा दर्शन अगली जगह का दर्शन next पोस्ट में......
नालंदा
नालंदा 5 वीं और 6 वीं शताब्दी में गुप्त साम्राज्य के संरक्षण के तहत और बाद में कन्नौज के सम्राट हर्ष के अधीन विकसित हुआ | गुप्त युग से विरासत में मिली सांस्कृतिक परंपरा 9 वीं शताब्दी तक विकास और समृद्धि की अवधि हुई |बाद में इसका धीरे -धीरे गिरावट का समय था |
नालंदा प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का विख्यात केंद्र था | बौद्ध धर्म में (महायान और हीनयान )के साथ अन्य धर्मो के तथा अनेक देशो के छात्र यहाँ पढ़ते थे |
यह राजगीर से 11. 4kmउत्तर में स्थित है | नालंदा विश्व विद्यालय दूनिया का दूसरा प्राचीन विश्व विद्यालय है | 7 वीं शताब्दी में भारत के इतिहास को पढ़ने आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा ितिसंग के यात्रा विवरणो से नालंदा विश्व विद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है | अलेक्जेंडर द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्व विद्यालय के अवशेष इसके प्राचीन वैभव के बारे में बहुत कुछ बताता है | इस विश्व विद्यालय में 10000 छात्रो को पढ़ाने केलिए 2000 शिक्षक थे | प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7 वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था |प्रसिद्ध बौद्ध सारिपुत्र का जन्म यहीं हुआ था |
यहाँ के लाईब्रेरी में हजारो पुस्तको के साथ 90 लाख पांडुलिपियाँ रखी हुई है | इस जगह को बख्तियार खिलजी ने आक्रमण कर आग लगा थी , जिसे बुझाने में 6 महीने से ज्यादा समय लग गए थे | नालंदा 800 साल तक अस्तित्व में रही |यहाँ छात्रों का निः शुल्क शिक्षा दी जाती थी |इस यूनिवर्सिटी में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि कोरिया ,जापान ,चीन ,तिब्बत ,इंडोनेशिया ,ईरान ग्रीस ,मंगोलिया समेत कई दूसरे देशो के छात्र भी पढाई के लिए आते थे |
नालंदा यूनिवर्सिटी की स्थापना 5 वीं शताब्दी में गुप्त वंश के शासक सम्राट कुमार गुप्त ने की थी | गौतम बुद्ध भी यहाँ कई बार यात्रा लिए आये और रुके भी थे |
यूनिवर्सिटी में 'धर्म गूंज ' नाम की लाइब्रेरी थी , जिसका अर्थ 'सत्य का पर्वत 'से था | लाइब्रेरी के 9 मंजिलो में तीन भाग थे ,जिनके नाम 'रत्नरंजक ',रत्नोदधि ',और 'रत्नसागर 'थे |
नालंदा यूनिवर्सिटी में हर्षवर्धन ,धर्मपाल ,वसुबन्धु ,धर्मकीर्ति ,नागार्जुन के साथ कई अन्य विद्वानों पढाई की थी |
स्थापना व संरक्षण :-
इस विश्व विद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम 450 -470 को प्राप्त है | इस विश्व विद्यालय को हेमंतकुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला | गुप्त वंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासको वंशो ने इसकी समृद्धि में पूरा अपना योगदान दिया था | इसे हर्षवर्धन और पाल वंशो का भी संरक्षण मिला ,इसे विदेशी शासको से भी अनुदान मिला |
स्वरूप :-
यह दुनिया का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्व विद्यालय था | यह अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था | इसके परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था | जिसमे प्रवेश के लिए लिए एक मुख्य द्वार था | उत्तर से दक्षिण की ओर मठो की कतार थी ,और उनके सामने अनेक स्तूप और मंदिर थे | मंदिरो में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थी | केंद्रीयविद्यालय में 7 बड़े कक्ष थे,और इसके अलावा 300 अन्य कमरे थे | इस विश्व विद्यालय में मेरिट पे दाखिला होता था ;निःशुल्क पढ़ाया जाता था |
ऐतिहासिक उल्लेख :-
चीनी विद्वान यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने कई वर्षो तक यहाँ सांस्कृतिक व दर्शन की शिक्षा ग्रहण की | ह्वेनसांग ने लिखा है ,कि सहस्त्रो छात्र नालंदा में अध्ययन करते थे,और इसी कारण नालंदा प्रख्यात हो गया था | इत्सिंग ने लिखा है की विश्व विद्यालय के विख्यात विद्वानो के नाम विश्व विद्यालय के मुख्य द्वार पर स्वेत अक्षरो में लिखे जाते थे |

अन्य स्थल :-
विश्व विद्यालय परिसर के विपरीत दिशा में एक छोटा सा पुरात्विक संग्रहालय बना हुआ है | इस संग्रहालय में खुदाई से प्राप्त अवशेषों को रखा गया है |
यहाँ भगवान् बुद्ध की बहुत साड़ी मूर्तियों का संग्रह रोचक लगता है | सबसे रोचक बुद्ध की टेराकोटा मूर्तियां लगती है,जो यहाँ बहुत व्यवस्थित राखी गई है |
नई नालंदा महाविहार :-
यह एक शिक्षा का केंद्र है | इसमें पाली और बौद्ध धर्म की पढ़ाई तथा शोध होती है | यह एक नया स्थापित संस्थान है |
ह्वेनत्सांग मेमोरियल हॉल :-
यह एक नया निर्माण भवन है | जो चीन के महान तीर्थ यात्री ह्वेनत्सांग की स्मृति में बनवाया गया है |
बड़गांव ,सिलाव राजगीर:-
बड़गांव नालंदा का सबसे निकट का गाँव है | यहाँ एक सरोवर और प्राचीन सूर्य मंदिर है ,यह स्थान छठ पूजा के लिए प्रसिद्ध है| नालंदा से कुछ दूर पर सिलाव स्थित है ,जो मिठाई "ख़ाजा"के लिए प्रसिद्ध है | इसके पास में ही राजगीर है |अब कुछ नई पहलू :-
नालंदा विश्व विद्यालय के नाम पर एक नए विश्व विद्यालय की स्थापना की है ,प्रसिद्ध नोबल पुरस्कार विजेता साहित्यकार अमर्त्य सेन अनुसार वर्ष 2010 में शैक्षणिक सत्र आरम्भ हो गए | इसको फिरसे बनाने में सिंगापूर ,चीन जापान व दक्षिण-कोरिया ने भी सहयोग दिया है |
कोसिस यह है कि इसके पुराने स्वरूप को कोई हानि न पहुंचे और यह फिर से नया और सुन्दर व्यवस्थित हो जाए |
ये था आज का नालंदा दर्शन अगली जगह का दर्शन next पोस्ट में......

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